Photo by Honey Fangs on Unsplash

In this post we will see ,how we can perform various operations on the slices.

Unlike arrays we can append and extend the slices ,but first we will see different ways of initialization of slices and we will see different operations further.

Slice initialization

There are various ways to initialize the slice and below are four ways which are used (please refer initialization program for below):-

As shown below “a” slice has been initialized with literals and here we haven’t defined any size separately (like we used to define in Arrays)

2. Initializing the slice with “make” function…


Photo by Kym MacKinnon on Unsplash

मृत्यु का आह्वान

एक दिन सर्द सुबह में
जब धूप ने आंखे खोली ना हो
धीमे से मेरे सिरहाने पर
मृत्यु तुम आना एक पूर्ण विराम लिए

जिस घर में मैंने चलना सीखा
उसी घर में तुम भी आना
सार्थक -निरथर्क जीवन की परिभाषा को
अंतिम आकार देने ..तुम भी आना

अधूरी इच्छाऐं हमेशा ही रहेगी
इस आंगन में शायद मेरी कमी खलेगी
मुझे पंच-तत्त्व में विलीन करने को
तुम आना..सवेरे को कुछ देर ग्रहण करने को

ठंडी देह अंतिम शय्या के लिए आतुर होगी
बस सांझ तक अंतिम यात्रा शुरू भी होगी..
तुम आना मेरी ड्योढी पर
इस शरीर को निराकार करने


Photo by Adrian Pelletier on Unsplash

झील पर उतरी शाम आज भी
जाने क्यों मायूस नज़र आती है
अकेली है ,उदास भी, और चेहरे से परेशान भी
जाने किस ग़म में लिपटी नज़र आती है
मैं हूँ तन्हा और वह भी शायद
बस यही एक बात वो भी
कानो में चुपके से कह जाती है |

वो गलीयाँ ,वो मंज़र,वो उन दिनों की धूप
और कोई पुराना लम्हा लिए,आँसू भी बहाती है
क्या दूं मैं दस्तक उस वक़्त के दरवाज़े पर
उस घर के हर इन्सान की तो बस नब्ज़ डूबती नज़र आती है
कोई रखे न रखे मेरे पास तो अब भी है बाकी
वो यादें,वो लम्हे और वो हर…


Photo by Dmitry Ratushny on Unsplash

एक उम्र गुजर गयी कुछ ख्वाब देखते हुए

एक उम्र गुजर गयी कुछ ख्वाब देखते हुए
हमने कुछ हसरतो को मुकम्मल होते हुए नही देखा

कुछ परिंदे है यह मेरे आशियाने के
जिन्हें हमने कभी उड़ते नहीं देखा

दर्द से सराबोर है आँखों का समंदर
हमने कुछ ज़ख्मो को सूखते नहीं देखा

उम्मीद में जिये थे कुछ और साल हम
वादों को जब तक हमने टूटते नहीं देखा


Photo by Aaron Burden on Unsplash

एक धागे के सिरे के संग संग
कुछ कुछ बनता जाता हूँ

चाहता हूँ उससे भी बहुत कुछ
पर जाने क्यों न कह पाता हूँ

बन जाते हैं ऐसे ही जाने कब रिश्ते
रिश्तो के ताने बाने को
समझ कभी नहीं पाता हूँ

एक धागे के सिरे के संग संग
कुछ कुछ बनता जाता हूँ

कुछ अरसे के बाद ही एक रंग पुराना लगता है
चलता है जो मेरे संग संग ,वह रिश्ता बेगाना लगता है
पर फिर भी कोशिश करता हूँ

एक धागे के सिरे के संग संग
कुछ कुछ बनता जाता हूँ

टूट जाता है कभी मगर क्यों…


Photo by Kristina Tripkovic on Unsplash

कह न पाया तुझसे मैं हाल-ए-दिल
पर अब भी लगी दिल में एक आग सी है
कभी तुम समझ लो खामोश निगाहों का इशारा
इन्ही निगाहों में छुपा इज़हार का एहसास भी है

कभी तरफ हालात हमारे न होंगे
गुज़र गया वक़्त तो हम साथ भी न होंगे
निगाहें चुराकर निकल जाने को मिल जाएंगे और भी राह में
आज जो हालात हमारे हैं कल तुम्हारें साथ भी होंगे

वो कदम बढ़ाने में तुम देरी न करो
शाम ढल जाएगी तुम शम्मे जलाने में देरी न करो
आँखों के सहारे कुछ बहने को है आज
बहने दो इसे आज ,आज देरी न करो…


Photo by Andrew Buchanan on Unsplash

आज कुछ अरसे के बाद ,कुछ चेहरे पुराने याद आये
दराजों में बंद कुछ ख़त पुराने हाथ आये|

कई चेहरे बनाते ,मुस्कुराते-रुलाते
हाथ पकड़ कर ,बीते अरसे की सैर करते
धुंधलाते से अतीत की
एक सुन्दर सी तस्वीर बनाते |

कहानी के जैसे पात्र हैं लगते
आँखों में बहुत सा दर्द समेटे
अंधी गली में दूर तक जाते

पुराने खतों में फिर भी मिल ही जाते|
छोड़ तो दूँ किसी मुहाने पर
कदम वहीं ठीठक जातें हैं
पुराने खतों के शब्दों में
फिर दफन कहीं हो जातें हैं |

आज कुछ अरसे के बाद ,कुछ चेहरे पुराने याद आये ..


Photo by Joshua Ness on Unsplash

कितनी बार मिला हूँ तुमसे
पर कोई बात अधूरी रहती है

आँखों से गुजरी हुई
कोई प्यास अधुरी रहती है
रोज़ मिलते हैं हम मगर
पर हर मुलाक़ात अधूरी लगती है
तुम्ही जोड़ दो कोई रिश्ता ख़ुशी से
अब तो यह ज़िन्दगी अधूरी लगती है

कितनी बार मिला हूँ तुमसे
पर कोई बात अधूरी रहती है

गिरते शाख से जब सूखे पत्ते
हमको तब भी उम्मीद सी लगती हैं
चाँद के दर्पण में आज भी
कोई तस्वीर तो बनती हैं
कोई रोता है जब रातों में
हमको भी तकलीफ तो होती है

कितनी बार मिला हूँ तुमसे
पर कोई बात अधूरी…


Photo by Nathan McBride on Unsplash

मै आरज़ू करता हूँ तेरी आहट की ...

दिन के हर ठहरे हुए पहर के साथ
भीड़ में खोने से पहले ,आसुओं के गिरने के साथ
दिल सोचता है अब भी उन्ही भी हुई शामों को
गुज़र जाती जो कभी ,तेरी मुस्कुराहटों के साथ

मैं आवारा हूँ आज भी फिरता हूँ रंगीन बादलो के साथ
ख्वाबों के पीछे दौड़ता हूँ मशालों के साथ
बिछड़ा हुआ हर मौसम याद है मुझे
निकला था जब मैं तेरी रुखसती के साथ

हज़ारो सवाल आज भी उन ख्वाबों के है ,जो देखे थे तुम्हारे साथ
जज़्ब एहसासो की बारात कभी तुम भी देखो मेरे साथ
गलियारें देखो सूने है दिल के आज भी तुम्हारे बगैर
कभी खो जाओ तुम भी शाम के गहरे रंग में मेरे साथ

मै आरज़ू करता हूँ तेरी आहट की ...


Photo by santosh verma on Unsplash

एक कवि की प्रेयसी कभी कभी
शायद ऐसी ही दिखती होगी

ग्रीष्म का ज्वार लिए
सूर्य जब तपता होगा
छाँव पाने पल भर के लिए
शायद तुमको तकता होगा

अल्हड तुम्हारी आँखें फिर भी
तपिश के कारण झुक जाती होगी
तीखी-तीखी दृष्टि सूर्य की
तुम पर ही पड़ जाती होगी

श्वेद तुम्हारा जाने कब
महुआ जैसा महक जाता होगा
मादक बन सूर्य को भी
अस्त हो ही जाना पड़ता होगा

मदभरी यह रातें लम्बी
गहरी आँखों से , फिर बातें कितनी करती होगी

एक कवि की प्रेयसी कभी-कभी
शायद ऐसी ही दिखती होगी

Nagesh Tejwani

IT professional ,Poet

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