Nagesh Tejwani

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मृत्यु का आह्वान

एक दिन सर्द सुबह में
जब धूप ने आंखे खोली ना हो
धीमे से मेरे सिरहाने पर
मृत्यु तुम आना एक पूर्ण विराम लिए

जिस घर में मैंने चलना सीखा
उसी घर में तुम भी आना
सार्थक -निरथर्क जीवन की परिभाषा को
अंतिम आकार देने ..तुम भी आना

अधूरी इच्छाऐं हमेशा ही रहेगी
इस आंगन में शायद मेरी कमी खलेगी
मुझे पंच-तत्त्व में विलीन करने को
तुम आना..सवेरे को कुछ देर ग्रहण करने को

ठंडी देह अंतिम शय्या के लिए आतुर होगी
बस सांझ तक अंतिम यात्रा शुरू भी होगी..
तुम आना मेरी ड्योढी पर
इस शरीर को निराकार करने